Matka aur uska paani



कुछ अलग ही बात होती है,
इस मटके वाले पानी में,
ना जाने क्यों ऐसा लगता है,
की रूह तक शांत हो जाती है,
समय ने कुछ बदल दिया है हमें,
मटके से बेहतर बर्फ नज़र आती है,
क्यों है ऐसा, समझ नहीं पाता हूँ,
क्यों धरती से प्रेम होने पर भी,
मटके को न कह जाता हूँ,
वह सोंधी सी खुशबू मिटटी की,
जो मटके से आती है,
मेरी रूह को जो खुशबू,
कुछ ख़ास कह जाती है,
काश यह बर्फ ने जीवन में,
अपनी पैठ न बनाई होती,
तो आज भी सोंधी सी वह खुशबू,
मेरे ज़हन पे छाई होती,
चलो वादा करें खुद से,
कम से कम एक मटका तो होगा घर पे,
इन गर्मियों में शायद,
इसी से उस कुम्हार के घर में रौशनी हो जाये….


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